Friday, 3 July 2015

उठ चलें

चाँद हो लेकिन जहाँ पर, चाँदनी रातें न हों
प्रेम का सागर भरा हो, प्रेम की बातें न हों
मानवों के चित्र हों, पर मानवी जातें न हों
उठ चलें इस गाँव से, रहकर करेंगें क्या भला !!

देख लो चारों तरफ, छाई हुई है गंदगी
गंदगी का विष पचाकर, जी रही है जिंदगी
नाबदानों में पडे, मालिक यही है गाँव के
उठ चलें वरना इन्हें, करनी पड़ेगी बंदगी!!

रोशनी कालिख पुती, अंधेर का साम्राज्य है
अपने किए ही कर्म पर, सब को बड़ा ही नाज है
उठ चलें वरना यहाँ, ज्यादा घुटन बढ़ जाएगी
चंद किरणों के लिए, सूरज यहाँ मोहताज है!!

आभूषणों में जड़ गए, पत्थर की जो बेकार थे
मातम मनाए जा रहे, मानते जहां त्योहार थे
उठ चलें तुम बच गये, यह कौन चोटी बात है

इंसानियत को मरने ही, चल रहे हतियार थे!!

Thursday, 25 June 2015

नेता महान है

दो आदमी रास्ता चलते बात कर रहे थे
एक ने दूसरे से कहा- " वैसे तो देवताओं मे सर्वश्रेष्ठ वीर हनुमान है, लेकिन आज का नेता उनसे भी ज्यादा महान है|"
दूसरा व्यक्ति बोला- " यह तुम कैसे आँक रहे होमालूम पड़ता है पीकर आए हो या चंडूखाने की गप्प हांक रहे हो|"
पहला व्यक्ति बोला- नहीं यार " हनुमान ने सूरज खाया था, नेता चंदा खाता है|
हनुमान ने तो सबके कहने से उगल दिया था, नेता साफ निगल जाता है||

इसलिए मेरा तो यही अनुमान है- हनुमान जी से ज्यादा आज का नेता महान है|