Friday, 3 July 2015

उठ चलें

चाँद हो लेकिन जहाँ पर, चाँदनी रातें न हों
प्रेम का सागर भरा हो, प्रेम की बातें न हों
मानवों के चित्र हों, पर मानवी जातें न हों
उठ चलें इस गाँव से, रहकर करेंगें क्या भला !!

देख लो चारों तरफ, छाई हुई है गंदगी
गंदगी का विष पचाकर, जी रही है जिंदगी
नाबदानों में पडे, मालिक यही है गाँव के
उठ चलें वरना इन्हें, करनी पड़ेगी बंदगी!!

रोशनी कालिख पुती, अंधेर का साम्राज्य है
अपने किए ही कर्म पर, सब को बड़ा ही नाज है
उठ चलें वरना यहाँ, ज्यादा घुटन बढ़ जाएगी
चंद किरणों के लिए, सूरज यहाँ मोहताज है!!

आभूषणों में जड़ गए, पत्थर की जो बेकार थे
मातम मनाए जा रहे, मानते जहां त्योहार थे
उठ चलें तुम बच गये, यह कौन चोटी बात है

इंसानियत को मरने ही, चल रहे हतियार थे!!

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